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Tuesday, 10 March 2009

भगवान के लिए मेरी पत्नी को बचा लीजिये डॉक्टर…….|


अन्दर हाल की चकाचौंध और जलते-बुझते बल्बों को देखकर दीनू की आँखें चुंधिया जाती है | वह वाही खड़ा हो जाता है और हाल के वातावरण पर नजर दौड़ता है |

पार्टी में आनंद का माहौल था, शराब, कबाब और शबाब तीनों का अच्छा मिश्रण बना हुआ था जो लोगों को आनंदित कर रहा था |

दीनू पूरे हाल में नजर दौड़ता है | परन्तु उसे डॉक्टर साहब कही नजर नहीं आते, वह अपनी तरफ़ आते एक व्यक्ति को देखता है जो हाथों में ट्रे लिए हुए था जिसमे शराब के खली कप रखे थे , शायद वह कोई नौकर था |

दीनू (हाथ जोड़ते हुए) -”राम-राम भैया|”

नौकर -”राम-राम कहो किस्से मिलना है |”

दीनू - “भैया मुझे डॉक्टर साहब से मिलना है | मेरी पत्नी बहुत बीमार है |”

नौकर (उँगली से इशारा करते हुए) -”वों वहाँ उस कोने में उस औरत के साथ डॉक्टर साहब खड़े है |”

दीनू डॉक्टर साहब की तरफ़ दौड़ पड़ता है | डॉक्टर साहब मिसिज खन्ना के साथ हाथ में शराब का जाम लिए खड़े थे | मिसिज खन्ना भी होठों में सिगरेट दबा ये डॉक्टर साहब से हँस-हँस के बातें कर रही थी, कभी -कभी बीच-बीच में डॉक्टर साहब के जाम से एक आध घूँट शराब की भी भर लेती थी |

दीनू दौड़ते हुए डॉक्टर साहब के पैरो में गिर पड़ता है | वह डॉक्टर साहब के पैरो को पकड़ लेता है |

-”डॉक्टर साहब मेरी पत्नी को बचा लीजिये, भगवान के लिए मेरी पत्नी को बचा लीजिये डॉक्टर, वह चारपाई पर पड़ी तड़प रही है |” दीनू जोर-जोर से रोने लगता है | उसके रोने की आवाज से पूरा हाल गूंज उठा था | लोगों ने दीनू के रोने की आवाज सुनी तो पूरा हाल शांत हो जाता है |

डॉक्टर साहब चिल्लाते हुए बोले -”अरे तू फिर आ गया मैंने कहा था मैं अब नहीं देखूँगा, सुबह को आ जाना, छोडो मेरे पैर को|”

दीनू पैर नहीं छोड़ता बोला -”सुबह तक तो वह साहब मर जायेगी |”

-”मर जायेगी तो मर जाने दो, तुम जैसे सैकड़ों आते है यहाँ|”

दीनू जोर-जोर से रो रहा था, आंसुओ से उसका कुरता गीला हो गया था | हाल में उपस्थित अधिकारी गण और अन्य व्यक्तियों को उसकी हालत पर तरस नहीं आता ,वे पैरो टेल कुचलती इस गरीबी को देख रहे थे |

कुछ दूर पर खड़े डॉक्टर खन्ना दीनू को देखकर आग बबूला हुए जा रहे थे बोले -” जाने कहा से आ गया मनहूस , सरे रंग में भंग दाल दिया, जाहिल गावर कही का | अरे कोई है यहां जो इस गवार को बहार निकल सके |”

दो नौकर दौड़ते हुए आते है -”जी साहब “

-”इसे बहार निकालो यंहा से |”

वे दोनों खींचकर दीनू के हाथो को पकड़ लेते है | लेकिन दीनू डॉक्टर साहब के पैरो को पकडे रहता है | वे दोनों उसे खीचकर डॉक्टर साहब से अलग करते है और उसे मरे कुत्ते की तरह से फर्श पर घसीटते हुए चलते है | और फ़िर किसी कूडे की भांति उसे हाल से बहार फेंक देते है |
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Sunday, 15 February 2009

दीनू गार्ड के पाँव पकड़ लेता है, उसकी आंखें भर आई थी |


दीनू बैलगाड़ी को खड़ी करके डॉक्टर साहब के मकान की तरफ़ दौड़ता है | वह दरवाजे को जोर-जोर से खटखटाता है | कुछ देर बाद दरवाजा खुलता है तो एक दस बारह साल की लड़की आती है |

दीनू -”बेटी डॉक्टर साहब है क्या?”

लड़की -”नहीं पापा तो पार्टी में जा चुके है |”

दीनू -”पार्टी कहा चल रही है बेटी ?”

लड़की -”वहाँ देखो जंहा वह लाल बल्ब जल रहा है |”

दीनू तेजी से उस हाल की तरफ़ चल देता है जहाँ पार्टी चल रही थी | दीनू का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, उसके पैर तेजी से हाल की तरफ़ बढ़ रहे थे | फुलवा के चिल्ला ने की आवाज इतनी दूर भी उसे स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी | हाल के बहार हाथ में डंडा लिए एक गार्ड खड़ा था | वह दीनू को रोक लेता है |

“अरे ऐ कहा घुसे जा रहे हो ?”-गार्ड ने कड़क आवाज में पूछा |

-”भैया मुझे डॉक्टर साहब से मिलना है | मेरी पत्नी बहुत बीमार है |”

-”नहीं डॉक्टर साहब पार्टी में व्यस्त है, वह अब किसी को न देखेंगे |”

दीनू (हाथ जोड़ते हुए ) - “भैया बुला दो ना, भगवान तुम्हारा भला करेगा, मेरी पत्नी की दर्द के मारे जान निकली जा रही है | मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगा |”

गार्ड -”अच्छा ठीक है देखता हूँ |”

गार्ड अन्दर चला जाता है दीनू बहार दरवाजे पर खड़ा रहता है | कुछ देर बाद गार्ड आता है |

दीनू ( उत्सुकता से ) - “क्या कहा भैया डॉक्टर साहब ने ?”

गार्ड - ” वे नही आ सकते कहा है सुबह को देखंगे |”

दीनू के कानों में फुलवा के चिल्ला ने की आवाज अब भी आ रही थी, जो दीनू के दिल की बेचैनी को बढ़ा रही थी |

दीनू -”भैया , मुझे जाने दो न डॉक्टर साहब के पास, मै उनकी ख़ुशामद करके उन्हें जरूर बुला लाउंगा |

गार्ड -”नहीं,नहीं खन्ना साहब ने अन्दर आने के लिए मना किया है |”

-”जाने दो ना भैया मै तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ ” दीनू गार्ड के पाँव पकड़ लेता है, उसकी आंखें भर आई थी |

गार्ड -” ठीक है, ठीक है,मेरे पाँव छोडो लेकिन यदि कुछ उलटा सीधा हुआ तो उसके तुम जिम्मेदार होंगे |”

दीनू खड़ा होता है और दरवाजा खोलकर अन्दर चला जाता है
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Monday, 8 December 2008

फ़ुलवा चारपाई पर पडी प्रसव पीडा से कराह रही थी |


*******

सावन का महीना था और बारिश का मौसम चल रह था ।फ़ुलवा चारपाई पर पडी प्रसव पीडा से कराह रही थी ।पड़ोस की कुछ अनुभवी स्त्रिया भी उनके पास थी ।दोपहर के तीन बजने को आ चुके थे |लेकिन फ़ुलवा कि तबीयतमें कोई सुधार न था ।उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी ।हरिया और दीनू बाहार नीम के पेड के नीचे बैठे हुक्कापी रहें थे ।पारो दौडती हुई आती है |

हरिया से - “ क्यों जी फ़ुलवा की तबीयत खराब होती जा रहीं है ,सुबह से शाम होने को आयी लेकिन कोई मुनाफा नजर नहीं आता,मेरी मानो तो फ़ुलवा को शहर ले चलो”|

हरिया - “ क्यों दीनू तुम किया कहते हो ? “

दीनू - “हा भैया में भी यही सोच रहा था “|

दीनू बैलगाड़ी में बैल जोत देता है तो सभी फ़ुलवा को चारपाई सहित बैलगाड़ी में लिटा देते है ।पारो कुछ कपड़े ओरअन्य आवश्यक सामान बैल-गाड़ी में रखती है ओर सभी शहर कि तरफ चल देते है |

वे लोग टेढे-मेढे ओर उचे-नीचे रस्ते से होते हुए तीन चार घण्टे बाद शहर पहुँच जाते है । शहर के बाहर सरकारी अस्पताल था,दीनू बैलगाड़ी को अस्पताल के अन्दर ले जाकर रोक देता है ।पारो ओर हरिया फ़ुलवा के पास रहते है

तो दीनू उतर कर अस्पताल के अन्दर पहुँचता है ।उसे अस्पताल में कोई नजर नहीं आता,दूर कोने में एक चारपाई पड़ी थी,चारपाई पर अस्पताल का एक कम्पाउन्डर पड़ा बीड़ी पी रहा था ।

दीनू -” क्यों भैया डाक्टर साहब नहीं है किया ?”

कम्पाउन्डर -”घर जा चुके है ।”

दीनू -”भैया मेरी पत्नी बहुत बीमार है डाक्टर साहाब को बुला दो ना।”

कम्पाउन्डर -”में नहीं जाता तुम्हें जाना है तो वों सामने पीला मकान डाक्टर साहब का ही है बुला लाओ।”

दीनू ने कुछ देर कम्पाउन्डर की तरफ़ देखा और फिर वह डॉक्टर साहब के मकान की तरफ़ चल देता है | वह दरवाजे पर पहुँच कर दरवाजा खटखटाता है | कुछ देर के बाद दरवाजा खुला |

-”क्या है? क्यों दरवाजा तोडे जा रहे हो ?”-डॉक्टर साहब दरवाजा खोलते की चिल्लाये |

दीनू (हाथ जोड़ते हुए ) -”डॉक्टर साहब मेरी पत्नी को बच्चा लीजिये,हम लोग दूर गाँव से आये है | वह बहुत बीमार है साहब |” दीनू की आँखें भर आई थी |

डॉक्टर साहब (झुंझलाते हुए ) - “मेरे पास समय नहीं है | डॉक्टर खन्ना के यहाँ मुझे पार्टी में जाना है | कही और ले जाओ ,जाने कहा से चले आते है ,गंवार कही के |” यह कहते हुए डॉक्टर साहब दरवाजा बंद कर लेते है |

दीनू ने जवाब सुना तो वह वापस दुखी होकर चल देता है वह निराश होकर कम्पाउन्डर के पास आता है और बोला -”भैया शहर में कोई दूसरा अस्पताल भी है किया |”

कम्पाउन्डर -”हाँ है अंदर शहर में एक प्राइवेट नर्सिंग होम है |” दीनू के दिल को कुछ धीरज बाँधता है |वह उधर बैलगाड़ी की तरफ दौड़ता है जंहा फुलवा करह रही थी |
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Saturday, 27 September 2008

चढ्ढा साहब सिगरेट सुलगाये पलंग पर तकिया के सहारे लेटे दम लगा रहे थे |


दीनू आँगन में चारपाई पर बैठा हुक्का गुडगुडा रहा था, हरिया को देखते ही -”आओ हरिया आओ ,क्या हाल है ?”
-”ठीक है भैया “-हरिया ने इतना कहा और वह चारपाई पर बैठ जाता है

-"कहो कैसे आना हुआ|"

हरिया -"भैया तुम तो जानते ही हो जब गाँव में नहीं थे तो ठीक था ,लेकिन जब अब आ गए है तो खाने के लिए अनाज आदि भी चाहेगा,सोचता हूँ नहर के पास में जो जमीन वर्षो से खली पड़ी है मे उस में अनाज बो दूँ ,लेकिन हल बैल कौन देगा|"

दीनू -”कैसी बात करते हो हरिया, भला मेरे बैल किस दिन काम आवेंगे | तू परेशान न हो , जब हम लोग ही एक दूसरे की सहायता नहीं करेंगे तो कौन करेगा ,कल सुबह ही दोनों खेत पर चलेंगे और खेत की जुताई करेंगे |"

हरिया -”मे तेरा अहसान कभी नहीं भूलूँगा दीनू |"

दीनू -”क्यों शर्मिंदा कर रहे हो,मे किसी पर अहसान नही कर रहा,बुरे दिनों मे एक दुसरे के काम आना अहसान नहीं बल्कि अपना फर्ज है |"

अगले दिन सुबह दीनू बैल और हल लेकर खेत की तरफ चल देता है | हरिया उसके पीछे कंधे पर फावड़ा रखे और हाथ में हुक्का लिए चल रहा था | दोनों खेत में पहुँच जाते है | वर्षो से खाली पड़ी जमीन काफी बंजर हो गई थी | साडी जमीन में दूब-घास आदि उग आए थे,कही-कही झाडियो के पेड़ भी उग आये थे | हरिया खेत में पहुँचता हें तो धरती माँ को प्रणाम करता है | वह माचिस से आग सुलगा देता है |दीनू हल चलाने लगता है | हरिया फावड़े से झाडिया आदि साफ़ करने लगता है | दोपहर को दीनू की पत्नी फुलवा खाना लेकर आती है |दोनों एक साथ बैठ कर खाना खाते है और फिर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़ाते है | शाम तक वे दोनों पूरे खेत को साफ़ कर देते है | अगले दिन दीनू बीज लाकर खेत में बुवाई करता है |अब वे एक दूसरे का सहारा बन गए थे और साथ-साथ खेती करने लगे थे |

*******

लगभग दो महीने बीत जाते है | रूबिया के बालक खोने का रंज दूसरे बालक ने भूला दिया था | वह अपने एक बालक के साथ खुश थी लेकिन घर में पड़े-पड़े वह बंधन सा महसूस करने लगी थी ,काफी दिनों से उसके ब्यूटी-पार्लर का काम भी अच्छा नहीं चल रहा था |

शाम के आठ बजने को जा रहे थे | वह बालक को पलने में लिटा देती है और किचन में जाकर खाना बनने लगती है | कुछ देर के बाद गाड़ी आकर रुकती है | चढ्ढा साहब दफ्तर से आ गए थे ,उनके हाथ में दो बड़े थैले थे जिनमे घर का कुछ सामान और सब्जिया थी, जिन्हें वो लाकर किचन में रख देते है और हाथ पैर धोने के लिए बाथरूम चले जाते है |रूबिया मेज़ पर खाना परोस देती है | दोनों बैठ कर खाना खाते है | लगभग रात के ग्यारह बज चुके थे , खाना खाकर वो अपने बेडरूम में चले जाते है |

चढ्ढा साहब सिगरेट सुलगाये पलंग पर तकिया के सहारे लेटे दम लगा रहे थे | रूबिया भी उनके सीने पर हाथ रखे उनकी बगल में लेती हुई थी |

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Saturday, 20 September 2008

“हमारा बच्चा “-रोती हुई रूबिया ने पालने की तरफ़ हाथ करते हुए कहा |


अचानक ही पारो हरिया के कंधे को हिलती है, “किस सोच में डूब गए हो , गाँव का स्टेशन आने वाला है”| हरिया को जैसे किसी ने कच्ची नींद से जगा दिया हो ,वह अपनी आंखें पोंछता है |

कुछ देर बाद गाड़ी स्टेशन पर रुकती है | नारायणपुर का स्टेशन आ गया था | हरिया गठरी को सिर पर उठता है और नीचे उतरता है | रेलगाड़ी चली जाती है | स्टेशन पर हरिया और पारो के सिवाय और कोई न था | हरिया आसमान की तरफ़ देखता है | चाँद अपनी चांदनी बिखेर रहा था | पूरब दिशा में भोर का तारा भी दिखाई दे रहा था | लगभग चार बजने को जा रहे थे , हरिया को कुछ ठण्ड महसूस होने लगी थी इसलिए वह गठरी से चद्दर निकलता है और उसे ओढ़कर गठरी सिर पर उठाकर चल देता है | पारो भी पीछे-पीछे चलती है वह एक टेढी मेढी पग डण्डी पर चलते है जो गाँव की तरफ़ जाती थी | रास्ते में उन्हें कही बाजरे के कटे खाली खेत दिखाई दे रहे थे तो कही ज्वार के खाली खेत | हरिया एक डंडा हाथ में लिए हुए था | थोड़ी देर में वह आपने आँगन में पहुँचता+ है | इस समय आँगन में लगा नीम का पेड़ काफी बड़ा हो गया था , एक कोने में पक्का कोठा था , जिसे उसके पिता ने बनाया था | उसके बाहर की तरफ़ एक छप्पर था जो अब टूटकर जमीन पर आ चूका था |

हरिया किवाड़ खोलता है , अन्दर एक झिंगला चारपाई पड़ी थी वह गठरी को उस पर रख देता है और गठरी से मोम बत्ती निकल कर माचिस जलता है , गठरी कुछ कपड़े निकल कर वह चारपाई पर बिछा देता है , पारो और छोटा बच्चा चारपाई पर लेट कर सो जाते है तो हरिया बाहर से कुछ छप्पर का टूटा फूस लाकर नीचे जमीन पर डालता है और उस पर एक चद्दर बछा कर वह भी सो जाता है | थोड़ी देर बाद ही बाहर बारिश आ गई थी |


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सुबह होती है तो सूरज काफी ऊपर चढ़ चूका था | रूबिया की आँखें खुलती है तो वह जँभाई लेते हुए बिस्तर से उठती है और अपने खुले बालों का जूड़ा बनाते हुए बच्चों के पलने के पास जाती है ,लेकिन पलने लेते एक बच्चे को देखकर उसका शरीर काँप जाता है | वह जोर से चीखती है और दौड़ कर सीढियो से नीचे उतरती है | इस समय उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था , ठण्ड होने के बावजूद भी उसके शरीर से पसीना छूट रहा था | वह दौड़ कर हरिया और पारो के कमरे में जाती है लेकिन वहाँ दो नंगी चारपाई के अलावा कुछ नहीं था | रूबिया का मनो जी ही निकल गया हो , वह दौड़ कर फिर अपने कमरे में आती है और चढ्ढा साहब को जगती है | रूबिया चढ्ढा साहब से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगती है | चढ्ढा साहब घबरा जाते है

-”क्या हुआ, क्यों रो रही हो”

-”हमारा बच्चा ” - रोती हुई रूबिया ने पलने की तरफ़ हाथ करते हुए कहा

-”क्या हुआ हमारे बच्चो को”

-”हमारे एक बच्चे को हरिया और पारो उठा ले गए है”

यह सुनते ही चढ्ढा साहब के शरीर से पसीना छूट जाता है | वह दौड़ कर पालने के पास जाते है लेकिन पालने में एक बच्चे को देखकर वो भी घबरा जाते है | उन्हें लगा मानों उनके पैरो तले की जमीन ही खिसक गई हो | वों दौड़ कर बाल कनी में आते है ओर हरिया ओर पारो को आवाज लगते है ,लेकिन रूबिया की तरह से वों भी निरुत्तर हो कर लोट जाते है |

रूबिया का रोते हुए बूरा हाल हुआ जा रहा था | चढ्ढा साहब रूबिया को अपने सीने से लगा लेते है उनकी आँखें भी भर आई थी |

-”रो मत रूबिया हम अपने बच्चे का पता जरूर लगा लेंगे, में अभी पुलिस को खबर करता हूँ “

चढ्ढा साहब फोन का रिसीवर उठाते हैं ओर पुलिस स्टेशन में सूचना देते है |

कुछ देर बाद पुलिस की गाड़ी आकर रुकती है ओर अन्दर से दो सिपाई ओर एक इंस्पेक्टर उतरते है वों लोग हरिया ओर पारो के कमरे का पूरा जायजा लेते है लेकिन कोई सबूत नहीं मिलता |

इंस्पेक्टर साहब -”चढ्ढा साहब वों दोनों आप लोगों के यह कितने दिनों से रह रहे थे “

“लगभग चौदह-पन्द्रह साल हो गए होंगे ,मेरे पिताजी ने ही उन्हें रखा था “- कहते हुए चढ्ढा साहब की आवाज भरी हो गई थी

-”आपके पास उनका कोई पता है वों लोग कहा के रहने वाले थे “?

-”जी नहीं “

-” क्या वों कभी अपने घर भी जाते थे “?

-”जी कभी नहीं गए “

-”इससे पहले कोई घटना उन्होंने की हो “

-”नहीं इंस्पेक्टर साहब , ऐसा कभी नहीं हुआ”

-”ठीक है हम शहर में अपने आदमी यो से उनका पता लगाने की कोशिश करते है जैसी भी सूचना मिलेंगी हम आप को इतला कर देंगे “

दस -बारह दिन बीत जाते है लेकिन बच्चे का कोई पता नहीं चलता |


*******


हरिया ( पारो से ) -”में सोचता हूँ , जमीन सुखी जा रही है क्यों न जोत कर गेहूँ की बुवाई कर दू “

-” हां कर दो खाने के लिए अनाज तो चाहिए ही “

-”लेकिन बैल,हल,बीज कहा से आएगा ” |

पारो -”दीनू भैया से ले लो जब आ जाएगा तो चूका देंगे “

हरिया -”ठीक है , देखता हूँ” | वह उठ कर दीनू के घर की तरफ चल देता है |
उपन्यास (भारत /India) से-(लेखक-विजय-राज चौहान)
पूरा उपन्याश पढने के लिए यहाँ चटका लगाये |

Saturday, 30 August 2008

तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी…….

………पारो की आँखों में आंसू थे,वह कुछ नहीं बोलती और हरिया की चारपाई से उठ कर अपनी चारपाई पर जाकर लेट जाती है | कुछ देर में वह सो जाती है |

हरिया भी अपनी चारपाई पर लेट जाता है |लेकिन उसकी आँखों में नींद न थी |वह सोने की कोशिश करता है लेकिन उसे नींद नहीं आती ,पारो ने ऐसी बात कही थी जिसने उसके मन में तूफान मचा दिया था |वह कभी इस करवट लेटता है तो कभी इस करवट | वह उठ कर बैठ जाता है |बण्डल से बीडी निकलता है और उसे सुलगा लेता है |वह एक अजीब कसम कस में फस गया था |उसके मन में अनेकों विचार आ रहे थे | वह सोच रहा था की जब कल को उसकी और पारो दोनों की उमर हो जायेगी तो कोंन उनका सहारा बनेगा | काफी देर सोचने के बाद वह फिर लेट जाता हे शायद वह किसी बड़े निर्णय पर पहुँच गया था | इसके बाद उसे नींद आ जाती है |

सुबह जब हरिया की आँखें खुली तो वह देखता हे कि सूरज का प्रकाश किवाड़ों कि झीरी से होकर अंडर आ रहा था |वह पारो कि चारपाई कि तरफ़ देखता है | पारो उठ कर जा चुकी थी , सूरज काफी ऊपर चढ़ चुका था | हरिया उठता है और कपड़े पहन कर आपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाता है |

लगभग तीन महीने गुजर जाते है दोनों बच्चे काफी स्वस्थ थे |चढ्ढा साहब ने साडी रिश्तेदारी में निमंत्रण भेज दिया था | उन्होंने शहर के सभी नमी ग्रामी हस्ति यो को पार्टी में निमंत्रित किया था और आज वह दिन आ गया था |

सुबह से ही घर में चहल - पहल थी | चढ्ढा साहब ने अनेकों प्रकार का खाना बनवाया था लेकिन मांसाहारी कुछ जायदा था | अब रूबिया की हालत भी अच्छी हो गई थी | वह टहलते हुए हर एक वास्तु को इस प्रकार चेक कर रही थी मनो कोई इजीनियर किसी फैक्टरी का जायजा ले रहा हो ,और भला चेक भी कियो न करे आज उनकी सहेली या और मित्र पार्टी में जो आने वाले थे |

गेट के बहार एक गाड़ी आकर रुकती है | गेट-कीपर गेट खोलता है | गाड़ी अंदर लान में रुकती है | उसके अंदर से एक पुरुष और एक औरत उतरती हे | औरत के हाथों में एक नवजात बच्ची थी जिसका जन्म पाँच महीने पहले हुवा था , यह औरत चढ्ढा साहब कि बहन मोहिनी थी | उनके साथ उनके पति भी थे |मोहिनी इंडिया एयर लाइंस में एयर होस्टिस थी | उनके पति बीमा कंपनी में मैनेजर थे | पैसा कमाने में ये लोग भी किसी से पीछे नहीं थे | घर में एक बूढी सास थी जो घर कि और छोटी बच्ची दोनों कि देखभाल करती थी |

शाम हो चुकी थी | चढ्ढा साहब का बँगला बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था | दोस्त और समंधी पार्टी में आने शुरू हो गए थे | इस समय चढ्ढा साहब और उनकी बीबी रूबिया दौड़- दौड़ कर रिसीव कर रहे थे |दोनों बच्चों को पारो संभाले हुए थे | टंडन साहब भी अपन परिवार के साथ आ रहे थे | वो अपनों गोद में अपनी बेटी एश्वेर्या को उठाए हुए थे और दूसरे हाथ में बच्चों के लिए कुछ उपहार लिए हुए थे ,इस समय वों अपनी भरी पत्नी के साथ ऐसे लग रहे थे मनो कोई महावत किसी हथनी के साथ चल रहा हो | एश्वेर्या को वे लोग पारो के पास छोड़ देते हे | हरिया भी मेहमानों की खातिर में व्यस्त हो जाता है |

पार्टी इस समय खत्म होने वाली थी और सभी लोग खाना खा रहे थे | सभी खाना खाकर बच्चो को आशीर्वाद देते है और अपने घर लोटने लगते है |लगभग रात के ग्यारह बजने तक सभी लोग लोट जाते है |

चढ्डा साहब और रूबिया दोनों खुश थे लेकिन इस समय वो इतनी शराब पी चुके थे की उनके कदम लड़ खड़ा रहे थे |हरिया और पारो उन्हें पकड़ कर उनके अमर में छोड़ आते है | हरिया बच्चो को भी उनके पास सुला आता है लेकिन दरवाजा बंद नही करता |

पारो कमरे में आ चुकी थी | वह सुबह से कम करते थक गई थी इसलिए वों जल्दी सो जाती है | हरिया कमरे में आता है और सामान बंधने लगता है | वह अपने सारे सामान को बाँध लेता है और चारपाई पर बैठ कर बण्डल से बीड़ी निकल कर सुलगा लेता है |फिर वह पारो को जगाता है ,पारो जगती है |

पारो -”क्यो इतनी रात क्यो जगा दिया “

हरिया कापती आवाज से -”जाओ एक बच्चे क्यों ले आओ गाँव चलते है “|

पुत्र मोह ने हरिया को अंधा कर दिया था | पारो ने सुना तो खुश हो जाती है ,उसकी नींद भाग जाती है | वह चारपाई से उठती है और धीरे धीरे सीढियो से चढ़कर कमरे के अन्दर झाकती है | इस समय रूबिया चढ्ढा साहब के सीने पर सिर रखकर गहरी नींद में सो रही थी , चढ्ढा साहब भी गहरी नींद में सोये हुवे थे |

पारो कमरे में प्रवेश करती है ,उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था वह कापते हाथों से छोटे बच्चे को उठा लेती है और नीचे आ जाती है | हरिया गठरी को उठा लेता हे और पारो को एक चद्दर ओढ़ने को देता हे | दोनों चुपके से बंगले के गेट से बहार निकलते है | सारा शहर इस समय नींद में सोया हुवाथा |

हरिया गठरी लेकर आगे चल रहा था और पारो उसके पीछे चल रही थी |रात के लगभग बारह बज चुके थे | वे स्टेशन पहुँचते है और गाँव के लिए गाड़ी में सवार हो जाते है |

हरिया गठरी को रखकर बैठ जाता है | पारो भी उसकी बगल में बैठ जाती है | हरिया गाड़ी से बहार देख रहा था और किसी गहरी सोच में डूबा हुवा था | वह उदास था ,लेकिन पारो बहुत खुश थी वह बच्चे को इस प्रकार चूम रही थ मनो कोई गाय अपने नवजात शिशु को चूम रही हो |

रेलगाड़ी पटरी पर दौड़ रही थी लेकिन हरिया अपने ही ख़्यालों में खोया हुवा था | उसे पन्द्रह साल पहले के वो दिन याद आ रहे थे जब गाँव में अकाल पड़ा था और वह पारो को लेकर शहर आया था | उसे याद आ रही थी वो पूस को रात जब वह अपनी नवविवाहिता पारो के साथ सड़क के किनारे पड़ा ठिठुर रहा था और चढ्ढा साहब के पिता उन्हें अपने घर ले गए थे | ये तुने अच्छा नही किया हरिया ,यह तो एक विश्वास घात किया किया हे तुने ,तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी ,भगवान तुझे कभी माफ नहीं करेगा-वह अपने आप को धिकारता है , उसकी आँखों में आंसू थे ,वह बहुत उदास हो गया था |
<<पीछे (विजय-राज चौहान के प्रकाशित उपन्यास "भारत /INDIA" से)

जारी है .....................